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Tuesday, 3 November 2015

सिख विरोधी दंगे और सियासी दांव

आम आदमी पार्टी (‘आप’) की दिल्ली के बाहर अब कहीं कोई संभावना बची है, तो वह पंजाब ही है। जाहिर है, 2017 के आरंभ में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले सिख मतदाताओं को लुभाने की अरविंद केजरीवाल हरसंभव कोशिश करेंगे। 1984 के सिख विरोधी दंगों की 31वीं बरसी को उन्होंने इसका ही मौका बनाया।
तब मारे गए तकरीबन 1,300 सिखों के परिजनों को उन्होंने पांच लाख रुपए के अतिरिक्त मुआवजे के चेक सौंपे। साथ ही उन दंगों की फिर से पड़ताल के लिए बने विशेष जांच दल (एसआईटी) का मुद्दा उछाला।
एनडीए सरकार ने यह एसआईटी बनाई है। केजरीवाल ने दावा किया कि केंद्र ने यह कदम इस भय से उठाया था कि दिल्ली में ‘आप’ सरकार बनी तो अपराधियों को सजा दिलवाएगी। यानी उन्होंने यह कहना चाहा कि केंद्र की एसआईटी मुजरिमों को बचाने की कोशिश का हिस्सा है। इसीलिए यह एलान किया कि क्या केंद्र को यह एसआईटी बनाने का वैधानिक अधिकार है, वे इसका परीक्षण कराएंगे। कहा जा सकता है कि एसआईटी पर विवाद खड़ा करना केजरीवाल की कार्यशैली के अनुरूप ही है।
सिख दंगों के बहाने उन्होंने पंजाब में अपने दोनों प्रतिद्वंद्वियों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। कांग्रेस तो खैर इस प्रकरण में घिरी ही रहती है, एनडीए सरकार द्वारा गठित एसआईटी को विवादास्पद बनाकर उन्होंने भाजपा-अकाली गठजोड़ पर भी गोला दागा है। लेकिन केजरीवाल की मुश्किल यह है कि पंजाब में अपनी पार्टी को संभाले रखने में वे नाकाम रहे हैं। इसी राज्य से ‘आप’ के चारों लोकसभा सदस्य चुने गए थे। मगर अब व्यावहारिक रूप में उनमें से सिर्फ एक ही केजरीवाल के साथ है।
जब पार्टी बिखराव की शिकार हो, तो दिल्ली में चले गए सियासी दांव कारगर होंगे, इसकी उम्मीद कम है। वैसे इस मौके पर केजरीवाल ने एक ऐसी बात कही, जिसे फौरी सियासी संदर्भों से अलग कर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 1984 के सिख विरोधी दंगों के दोषियों को सजा मिली होती, तो 2002 में गुजरात दंगे और इस वर्ष दादरी जैसी घटनाएं नहीं होतीं, न ही देश में ‘आज जैसी असहिष्णुता’ फैलती।
यह निर्विवाद है कि सामूहिक हिंसा में शामिल लोगों को दंडित करने का अपने देश का रिकॉर्ड बहुत खराब है। सिख विरोधी दंगों से देश के माथे पर जो कलंक लगा, वो आज तक नहीं धुला है। उससे भी ज्यादा अफसोसनाक यह है कि उन दंगों के आयोजक कानून की गिरफ्त में आने से बचे रहे (या उनको बचाया गया)। इसके विपरीत अगर सिख विरोधी दंगों के आरोपियों को ऐसी सजा दी जाती जो आगे के लिए मिसाल बनती, तो उसके बाद धर्म के आधार पर असहिष्णुता या हिंसा फैलाने की जुर्रत कोई नहीं करता।
दु:खद है कि उस और उसके बाद के दंगों की बातें आज भी जब उठती हैं तो उनके पीछे संकीर्ण राजनीतिक उद्देशय़ ही अधिक होते हैं। क्या इस उम्मीद का कोई आधार है कि यह सूरत कभी बदलेगी?