Showing posts with label Chandanjaiswal. Show all posts
Showing posts with label Chandanjaiswal. Show all posts

Thursday, 9 June 2016

कंज्यूमर कल्चर में बदल गए हैं प्यार के मायने


सामाजिक सरोकार के पैरवीकार माने जाने वाले फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने 2006 में 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्म बनाकर हलचल मचा दी थी। उसके बाद से वह लगातार सामाजिक मुद्दों को उकेरने वाली फिल्में ही बनाते रहे हैं। अब जबकि उनकी फिल्म 'रंग दे बसंती' के रिलीज को दस साल पूरे हो गए हैं, तो वह सामाजिक चेतना की बात को परे रखकर प्रेम कहानी वाली फिल्म 'मिर्जया' लेकर आ रहे हैं।
यह फिल्म पंजाब के सुप्रसिद्ध प्रेमी युगल मिर्जा़-साहिबा के जीवन पर आधारित फिल्म है। राकेश ने इसे किसी पीरियड फिल्म की तरह नहीं रचा है बल्कि उन्होंने इसे लव लिजेंड की कहानी को आज की प्रेम कहानी से जोड़ा है। गुलज़ार साहब ने इस कहानी में अपने गीत भी पिरोए हैं, जिन्हें शंकर एहसान लॉय ने संगीत से सजाया है।

साहिबा ने मिर्जा़ के तीर क्यों तोड़े?
राकेश बताते है कि मैं इसे दिल्ली 6 के बाद ही बनाना चाहता था, लेकिन तब भाग मिल्खा भाग की कहानी मिल गर्इ। इसके बाद तीन सालों तक कहानी आहिस्ता-आहिस्ता पकती रही। गुलज़ार भाई इस पर काम करते रहे। यह पोएटिक तरीके से लिखी गई। मिर्जा़-साहिबा की कहानी मेरे जहन में रह गई थी। कॉलेज के दिनों में पढ़ी इस कहानी में कुछ खास बात थी। साहिबा ने मिर्जा़ के तीर तोड़ दिए थे। क्यों तोड़े?

इसकी अलग-अलग व्याख्याएं है। गुलज़ार भाई ने अपने तरीके उसे लिखा है। मिर्जा़ का सूफियाना अंदाज था। बचपन से ही दोनों का रुहानी रिश्ता था, जो बड़े होने पर प्यार में बदला। दोनों के परिजन उनके प्रेम के खिलाफ थे। साहिबा बेहद खूबसूरत और भाइयों की लाडली थी। उसे मालूम था कि तीर तोडऩे पर मिर्जा़ अपनी और उसकी रक्षा नहीं कर पाएगा। एक तरह से उसने अपने प्यार की कुर्बानी दे दी। ‘मिर्जया’ में गुलज़ार भाई ने दोनों के प्रेम के रुहानी और सूफियाना भाव को आज के माहौल में रचा है। इन दिनों की फिल्मों में ऐसा ट्रीटमेंट नहीं मिलता।

रुहानी नहीं रह गया है अब प्रेम 
राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने यह स्वीकार किया कि कंज्यूमर कल्चर में प्यार के मायने बदल गए हैं। अब प्रेम रुहानी नहीं रह गया है, लेकिन यही तो खोज है। क्या आज के दौर के प्रेमी भी मिर्जा़-साहिबा की तरह जज़्बाती हो सकते हैं?

प्यार हो जाने के बाद क्या होता है? अतीत की सभी प्रेम कहानियां दुखांत रही हैं। जमाने के साथ हमारे आसपास की चीजें बदल जाती हैं। कम्युनिकेशन के तरीके बदल जाते हैं, लेकिन गौर करें तो प्रेम का अंदरूनी जज़्बा वैसे ही रहता है।

भीतरी स्तर पर इमोशन की लहर वैसी ही रहती है। उसके लक्षण थोड़े अलग हो जाते हैं। अभी दिखता है कि सभी नाप-तौल के प्यार कर रहे हैं। जीवन साथी के चुनाव में कई भौतिक चीजें देखी जा रही हैं। शहरों में तो दोनों एक-दूसरे के आर्थिक पक्ष पर ध्यान देते हैं। हम अपने पार्टनर जेवर की तरह चुनते और खरीदते हैं। मैं थोड़ा ओल्ड फैशन लग सकता हूं, लेकिन मेरे लिए प्यार भौतिक सुरक्षा से बड़ी चीज है। हम प्रेम को जैसे जीते और देखते रहे हैं, उसे ही अपनी फिल्मों में ले आएंगे। इस फिल्म के प्रेमी किरदार आज के जमाने से जूझते हैं।

'मिर्जया' में राकेश ने दो नए चेहरों को जगह दी है, अभिनेत्री तन्वी आज़मी की रिश्तेदार सैयामी खेर साहिबा का किरदार निभा रही हैं वहीं अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर मिर्ज़ा का।