Wednesday, 2 December 2015

कहां गए वो असहिष्णुतावादी लोग?

 
अगर पाकिस्तान ने भारतीय जनता पार्टी की बिहार चुनाव में हार पर जश्न मनाकर अमित शाह की पटाखे फूटने वाली भविष्यवाणी को सही साबित कर दिया तो इससे आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।

क्योंकि वह तो स्वभावत भारत में राष्ट्रवादी विचारधारा और स्वाभिमान से भयभीत रहता है। उसे तो मणिशंकर अय्यर जैसे लोगों की दरकार है जो नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए उससे मदद मांगते हैं।

मणिशंकर अय्यर ने आजकल दिग्विजय सिंह का स्थान ले लिया है जिन्होंने कुछ साल पहले उस पुस्तक का विमोचन किया था जिसमें लिखा गया था कि मुंबई आतंकी हमले की साजिश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ था।
अय्यर हों, शकील अहमद, सलमान खुर्शीद, आजम खां या इसी प्रकार के अन्य देशभक्त उन्हें भारत में उस प्रकार का माहौल बनाने में पाकिस्तान के हस्तक के रूप में दिखाई पड़ने में मजा आता हे, जो उसकी एकता को छिन्न भिन्न कर सके।
बिहार के निर्वाचन के समय भाजपा को पराजित करने के लिए देश में असहिष्णुता के माहौल का अतिरेक पैदा किया गया, उसकी शुरूआत भले ही परिवार से उत्पन्न खिन्नता के फलस्वरूप किसी महिला ने की होगी लेकिन उसका लाभ उठाने के लिए वे लपक पड़े जिन्होंने अतीत में लाशें बिछ जाने के बावजूद मौन रहना ज्यादा फायदेमंद समझा।

एक अखलाक अहमद की हत्या का बोझ उनके लिए हजारों सिखों ही नहीं बल्कि मलियाना से पुलिस द्वारा बंधक बनाकर, हत्या कर लाशें नहर में फेंक देने के कृत्य से भी अधिक भयावह दिखाई दिया ऐसे में लाखों की संख्या में कश्मीर से निकाले गये हिन्दू नहीं दिखाई पड़ रहे हैं जो दो दशक से भी अधिक समय से शिविरों में रह रहे हैं और जिनके पुनर्वास का मजहबी विरोध किया जा रहा है।

असहिष्णुता से क्षुब्ध होकर जिन्होंने सम्मान वापसी का अभियान चलाया उनका पेरिस हमले पर मौनव्रत भी समझना कठिन नहीं होना चाहिए क्योंकि जो घटनाएं सारी मानवता को हिला देने वाली होती हैं उनके प्रति संवेदनशील होना उनके स्वभाव में नहीं है।

जिस मजहब के प्रति उन्मादी आस्था रखने वालों ने पेरिस कांड किया, उसकी उलेमाओं तक ने निंदा की लेकिन असहिष्णुता के प्रति कटिबद्ध हमारे बुद्धिजीवियों, कला एवं कलमकारों में कोई संवेदना नहीं जागृत हुई।
उनकी इस मानसिकता के कारण क्या यह आरोप आधारयुक्त नहीं माना जा सकता कि केंद्रीय सत्ता में गुणात्मक परिवर्तन से उनकी रोजी?

रोटी के लिए जो संकट पैदा हुआ है उसके कारण वे उन लोगों के हस्तक बनकर खड़े हो गए जो कठपुतली के समान आचरण करने के लिए धागे को खींचते या ढील देते रहते हैं।

पेरिस की घटना पर उनके मौन से यह साबित हो गया कि भारत में असहिष्णुता के माहौल का उन्होंने जो शोर मचाया था उसका उद्देश्य कुछ और ही था। वे भाजपा से भयभीत होकर विश्व में भारत की बचती प्रतिष्ठा से चिंतित हैं।

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